रविवार, 6 अक्तूबर 2013

सास और साग - एक शोधयात्रा

खर-पतवार  या -Amaranthus virdis L.
कई दिनों से कुछ उधेड़बुन  में लगा था. उसका नतीजा आपके सामने इस शोधपत्र के रूप में प्रस्तुत है. चुकि हर  शोधपत्र  को किसी-न- किसी को समर्पित करने की परंपरा चली आ रही है इसलिए ये थीसिस भी किसी को समर्पित है. वो हैं हमारी सास यानि , 'मॉम-इन-लौ'.  उनके सहयोग और पर्यवेक्षण  के बगैर इस शोध का पूरा होना मुमकिन नहीं था।
एक और शख़सियत का नाम लेना जरूरी है। वो हैं हमारी श्रीमतीजी। उन्होंने इस शोध में बाधा नहीं डाली और इसलिए उनको भी धन्यवाद है। उनकी एकमात्र उत्साहवर्धक टिप्पणी जो रही वो कुछ यूँ थी ,
' तुमको भी कुछ काम नहीं है. बस बैठे हो कम्प्यूटर पर. एक तुम दामाद अलावलपुर के और एक तुम्हारी सास चोंचहां की।  दोनों की बुद्धि  साग -पात से ऊपर जा ही नहीं सकती'

खैर , मुद्दे पर आते हैं।  तो समस्या ये थी कि पिछले साल  घर के अहाते में घास कम और खर-पतवार ज्यादा उग आये थे।  सोसाइटी वालों की चिठ्ठी आ गयी तो हमने एक माली को काम पर लगाया। हमने कहा , ' हे माली महारज ! कृपया कर घास को पतवार और हमें सोसाइटी  के प्रकोप से मुक्ति दिलायें'।

उन्होंने २ दिन की मेहनत के बाद अहाते को पतवार ही नहीं , बल्कि घासमुक्त ही कर डाला। मैंने कहा कि ये तो बड़ा गजब कर दिया तुमने। एक  सुन्दर स्त्री  के केशों में कंघा फिराने के बहाने उसे पूरा गंजा कर डाला। माली महाराज बोले ,' घास कम खर-पतवार ज्यादा थे , इसलिए बेहतर यही है  कि इन्हें उखाड़ कर नयी मिट्टी डाल , घास के नए बीज डाले जाएँ। '
इस पुरे प्रकरण में मुझे पतवार के साथ-साथ, लगभग  हज़ार डॉलर से भी मुक्त  होना पड़ा.  लिहाजन बोनस , माली ने मेरे किचन-गार्डन पर भी कृपा दिखाई और ताजी मिट्टी  की एक सतह वहाँ भी डाल दी.

नयी मिट्टी, नयी संभावनाएं 

 नयी उर्वर मिट्टी डलते ही किचन-गार्डन का कलेवर बदल गया। मुझे उसमे टमाटर , भिन्डी , धनिया  और भी काफी कुछ ताजी सब्जियों की संभावनाएँ  दिखने लगीं। यूँ लगा जैसे वो 12'  x 8' की जमीन न हो कर एक बड़ा सा फ़ार्म हो।  मैं अपने सब्जबाग़ देखता भारत चला गया।  महीने भर बाद लौटा तो मेरी आँगनबाड़ी लहलहा उठी थी. सब्जियों से नहीं , बल्कि नयी क़िस्म की पतवार से। मैंने आक्रोश  से उन्हें उखाड़ना शुरू किया।  पर वो पतवार ही क्या जो एक बार उखाड़ देने से दुबारा न उग जाए. मैं थक गया पर पतवार ने हार नहीं मानी।  हर हफ्ते २०-२५ नए अंकुर फूट पड़ते।  खैर अक्टुबर आते-आते मौसम की ठण्ड ने इनकी बढ़त की रफ़्तार को रोक दिया।
2012 की सर्दी भर मैं घर में दुबका रहा और किचन गार्डन का रुख नहीं किया।

भूमिका तो ठीक है पर शोध कहाँ  है? 

आप कहेंगे कि खर-पतवार का दुखड़ा तो ठीक है पर इसमें शोध कहाँ है ? तो ऐसा ही कि शोध अब शुरू होता है।  इस साल मार्च -अप्रैल में जब पाला पड़ना बंद हुआ  तो मैंने फिर से अपनी आँगनबाड़ी यानि किचन गार्डन पर अपनी दृष्टी डाली । पतवार के जंगल को उखाड़ उसमें सब्जियाँ लगाने का प्रण दुहराया। जून में जब सास का पदार्पण हुआ तो हमने खीरा -टमाटर और जुकीनी के पौधॆ लगा भी दिये।  मॉम-इन-लॉ ने नियमित सिंचाई कर इनको जीवित रखा. सभी में  फूल आने लगे।

ये मुँह और गेंधारी का साग 

एक दिन सब्जियों की लतरों के  बीच झाँक रहे ढीठ पतवार को देख मैंने पूछा ,'ममी , ये कौन सा जंगल है? उखाड़-उखाड़ कर थक गया पर तब भी उग आता है.'
सास बोलीं ,' बेटा , ये तो गेंधारी के साग जैसा लग रहा है।  इसीलिये हम इसको नहीं उखाड़े और पानी भी पटा रहे हैं।  '
मैंने कहा, ' सचमुच ! हम तो कोई साग लगाए नहीं '
अब उनका कॉन्फिडेंस थोड़ा डगमगा गया।  बोलीं , ' पता नहीं , तुम्हारे अमरीका में साग होता है भी या नहीं। हो सकता है कोई मिलता जुलता जंगली पौधा हो. जहरीला भी हो सकता है। '

मैंने गेंधारी शब्द के बाद उनकी आगे की  चेतावनी शायद सुनी ही नहीं।  जबतक वो रुको-रूको करतीं  तब तक मैं अपनी नयी खोज के 3-4  पत्ते  चबा चुका था , और कुछ  उनकी तरफ बढ़ा चुका था।  'रुको बेटा , नहीं बेटा' बोलते -बोलते ,  मॉम-इन-लॉ ने भी अमरीकी गेंधारी चख ली.
शाम में तीन-चार घंटे का सस्पेंस  रहा.  सास थोड़ी घबरायी  सी रहीं।  मैंने  माहौल को हल्का करेने के लिए  श्रीमतीजी को बोला कि रात में यदि हमदोनों की तबीयत गड़बड़ हो तो फिक्र न करना। डॉक्टर के पास एक को ही ले चलना।  एक ही दवाई से हम दोनों ठीक हो जायेंगे।

शोध जोर-शोर से शुरू  हो गया 

सुबह उठते ही मैंने कहा , 'ममी , हमलोग ये जंगली पत्ता  खाकर भी ज़िंदा हैं. ये तो पक्का गेंधारी का साग ही है. चलिए आज इसी का साग बनाते हैं।'  बिद्यार्थी preliminary परिणाम पर ही अपना शोध खत्म करने की जल्दी में था लेकिन रिसर्च सुपरवाइजर इतनी जल्दी डिग्री देने के पक्ष में कतई नहीं थीं. 
उन्होंने कहा, 'बेटा, तुम तो मेरा बात पकड़ कर बैठ गए। अनेरुआ पौधे का साग खाना ठीक नहीं। '
मैं बोला , ' ठीक है। अब  हम आपको इसकी पूरी तसल्ली से पहचान  करवा कर  ही  इसका साग खिलाएंगे।'
इन्टरनेट पर गेंधारी साग खोजने बैठा तो ज्यादातर परिणाम, महाभारत वाली गान्धारी के निकले। खैर , खोज को रिफाइन करते -करते , बिरसा -मुंडा कृषी विश्वविद्यालय का एक रिसर्च पेपर निकल आया , ( Edible weeds of tribals of Jharkhand, Orissa and West Bengal ) . इस पेपर से मेरे शोध की कुंजी निकल आयी।
गेंधारी का बोटैनिकल नाम है -Amaranthus virdis L. इतना भर पता चलते ही मैंने Google  , YouTube , Amazon हर स्रोत खंगाल डाला।  गेंधारी को अंग्रेजी में Slender Amaranth या Green Amaranth भी कहते हैं।

शोध के परिणाम 

सारे शोध का लद्दोलबाब यह रहा कि  मैं घर के पिछवाड़े के जंगली पौधॆ के पत्ते ,तना , फूल सब कम्पुटर के बगल में रख , Green Amaranth की तस्वीरों से मिलाता रहा और सास को दिखाता रहा। लेकिन सास थीं कि पूरी तरह से संतुष्ट होने का नाम न लें।  कहें ,' जो फोटो दिखा रहे हो वैसा ही लग तो रहा है है लेकिन पता नहीं मन अभी भी नहीं मान रहा है। '
अब बस एक ही चीज बची थी मिलाने के लिए।  जंगली गेंधारी के सूखते फूलों में से मैं कुछ बीज झाड़ लाया। उनकी हाई resolution  फोटो उतारी और उसको अमरंथ के बीज के फोटो के साथ रख कर दिखाया।
अमरंथ के मानक बीज और किचन-गार्डन की गेंधारी के बीज 

मॉम -इन-लॉ आखिरकर कन्विंस हुईं।  
मैं फटा -फट 'जंगली बनाम असली ' गेंधारी के  पत्ते लेता आया।
एक दम सरल विधि से साग बनायी गयी।  रात के डिनर में सबने चाव लेकर एक-एक चम्म्च गेंधारी का साग खाया। इस घटना के तीन हफ्ते बाद ये वृतांत लिख रहा हूँ तो जाहिर है कि जीवित हूँ साग खा कर भी. 

मेरे साथ  आँगन-बाड़ी की बिचारी गेंधारी भी परीक्षा में पास हो गयी थी.



गेंधारी साग बनाने की सरल विधि 
एक चम्मच तेल , 1 /4  कप प्याज ,  1 /2  चम्मच कुतरा लहसुन और १ चम्मच सफ़ेद तिल, 1  हरी मिर्च  , ५०० ग्राम हरी गेंधारी या Green Amaranth ।  तेल गरम होने पर उसमे पहले तिल , फिर लहसुन और प्याज डालें।  २-३ मिनट तक भुने।  फिर साग डाल कर ,पानी सूखने तक पकाएँ  ।












शनिवार, 17 अगस्त 2013

माँ की बातें , कुछ खट्टी -मीठी यादें


नुकीली और गोल नाक वाले लोग 
कहते हैं कि जब दुर्योधन पैदा होने वाला था तब हस्तिनापुर में तमाम किस्म के अपशकुन होने लगे थे | अनायास उल्टी हवाएं बहने लगी , राजधानी के बाहर के जंगलों मे आग लग गयी और जंगली कुत्ते सियार रोने लगे | राज-परिवार मे ज्ञानी -बुजुर्गवार लोगों ने कहा - ' गान्धारी , यह संतान करूवंश के विनाश का कारण बनेगी इस का त्याग कर देना ही उत्तम होगा '
लेकिन गान्धारी एक माँ थी , पुत्र मोह कैसे त्याग देती दुर्योधन पैदा हुये , राज-घराने मे पले- बढे और परिणाम क्या हुआ ये बताने कि जरूरत नहीं

माँ कहती हैं कि मेरी पैदाइश के वक्त भी कुछ ऐसे ही शकुन हुए | कलियुग था | पिता हस्तिनापुर के राजा तो थे नहीं , अलावलपुर में बस थोड़ी बहुत खेती-बाड़ी थी सो घर के सामने जो आम -लीची के बगीचे थे बस उन्हीं में थोड़ा -बहुत अंधड़ सा उठा था | सियार तो रात मे रोज ही रोते थे लेकिन हमारी पैदाइश से पहले कुछ ज्यादा ही रोने लगे थे | एक और बात थी जो दुर्योधन के पदाईश के वक्त से ज्यादा भिन्न थी और ज्यादा बुरी भी |
वो ये कि माँ की तबीयत ज्यादा ही ख़राब रहती थी | मिर्ची के अचार और रोटी के सिवा तो कोई खाना जँचता था ना ही कुछ पचता था। इस खुराक पर क्या तबीयत ठीक रहती खाती कम थीं लोटा ज्यादा उठाती थीं बरसात के दिन , जाने क्या हो गया उन्हें कुछ -कुछ अजीबो गरीब चीज़ें (hallucinations) दिखने लगीं उनको |
गाँव की बड़ी-बुढ़ियों ने कहा - ' दुल्हिन के हवा लाग गेल हव | अब झड़वाव इनका के कौनो ओझा - बैद से | '
रघुवरा बहु को बुलाया गया तो उसने कहा - ' इनका भूत ले ले हव ' |

मैं भी कलियुगी बच्चा , गर्भ मे से बोल -सुन पाने की शक्ति नहीं थी अष्टावक्र की तरह | अगर होती तो कहता - ' अरे कहाँ आप लोग भूत खोजते -भगाते फिर रहे हैं , असली भूत तो अन्दर बैठा है और माँ को त्रस्त कर रहा है | एक बार बाहर जाने दो बिचारी ख़ुद --ख़ुद ही अच्छी हो जायेगी |'
वैसे शुक्र है कि मैने ये बात कही नहीं गावँ की कुछ परम दुष्टा काकी-दादियों ने कसर नहीं छोड़ी थी मेरी छुट्टी कर देने में लिहाजा - ' दुल्हिन के पेट मे राकस (राक्षस) बईठल हव लरिका माई के बचे देतई इत्यादि -इत्यादि "

खैर माँ उन काकी -दादियों से ज्यादा समझदार थी। तब मैट्रिक पास थीं और सबसे खास बात ये थी कि वो रामचरितमानस पढती थीं महाभारत का कहानी सन्क्षेप में ही पता थी दुर्योधन का जन्म प्रसंग जिस विस्तार से मैने आपको सुनाया है उस तरीके से सौभाग्यवश उन्हें किसी ने नहीं समझाया था। ना ही तब तक बी.आर. चोपड़ा साहब का सीरियल ही आया था
इस लम्बी कहानी का सार ये है कि मैं तमाम अड़चनो और अपशकुनों के बावज़ूद पैदा हो ही गया माँ को भी भूत-पिशाच, बुरी नजर और गाँव की बुढिय़ों की अनर्गल बकवास से मुक्ति मिली दुर्योधन के जन्म-सदृश लक्षणों के बाद भी मैं दुर्योधन बनते -बनते रह गया इसकी दो वजहें मेरे ज़ेहन मे आती हैं।
पहला मेरी माँ के पुर्व-जन्मों का फल और इस जन्म मे उनकी ईश्वर निष्ठा और भक्ति
दूसरा , शकुनी जैसे मामा का होना मेरे मामा बड़े सज्जन हैं। आज भी बहुत प्यार करते हैं हमसे। उनके बारे मे फिर कभी आज तो बेटा बस माँ की ही बातें करेगा
जननी और जन्मभूमि 


मैट्रिक पास करते ही मुश्किल से 17 साल की उमर में ब्याह हो गया था पिताजी से । उस समय माँ बहुत सुंदर हुआ करती थीं । मुझे आज भी लगती हैं और मेरे ख्याल से शायद हर बच्चे को लगती है । मेरी चाची कहती हैं - ' रे बउओ ! तोहर माई जब अल्थुन अलावलपुर मे बियाह हो के वो बेरिया अगल -बगल के पाँच गाँव मे हुनका जईसन सुंदर कौनो पुतोह न रहे | '
हम भाई -बहन जब इस बात का जिक्र करते हैं तो आज भी माँ थोड़ा सकुचा जाती हैं |

फ़िर कहती हैं , ' हमरा सुंदर भेला से कौन फायदा भेल | तोराहीन तीनों त चल गेले अपन बापे पर | सब के नाक हो गेलउ गोल -गोल लड्डू लेखा | '
सब कुछ बदला पर वो फसुला और सिलबट्टा वैसे का वैसा ही रहा 

हम भाई -बहन जब इस बात का जिक्र करते हैं तो आज भी माँ थोड़ा सकुचा जाती हैं |
फ़िर कहती हैं , ' हमरा सुंदर भेला से कौन फायदा भेल | तोराहीन तीनों चल गेले अपन बापे पर | सब के नाक हो गेलउ गोल -गोल लड्डू लेखा | '

माँ भूलती बहुत हैं | कहती हैं कि ये विरासत में उन्हें मेरी नानी से मिला है |
नानी के भूलने का आलम ये था कि कुछ जरूरी काम भूल न जाएं इसलिए अपनी साड़ी के पल्लू मे गाँठ पार लेती थीं | बाद मे गाँठ देखकर ये तो याद आता था कि कुछ काम करना है लेकिन काम क्या है वो तब भी याद नहीं आता था | फ़िर माँ को या मौसी को आवाज लगाती थीं - ' गे सुनेती ! ई ग़िठ्ठी काहेला पारले रली ह ? तोरा याद हउ का ? मारो -मुधके ! कुच्छो यादे न नु रहले । '
माँ नानी की इस धरोहर को नई उचाईयों तक ले गयीं |
इतवार के दिन खाना पका रहीं थीं | कुकर मे दाल चढ़ा कर बगल वाली राय चाची से कुछ बात करने लगीं | तब तक कुकर सीटी -पे- सीटी बजाता रहा | दौडीं वापस आयीं | कुकर खोला तो महज पानी उबल रहा था और घट कर आधा रह गया था | माँ अपनी यादाश्त को कोसते हुए फ़िर से दाल पकाने की तयारी में जुट गयीं |
एक बार दुर्गापूजा के समय रंगमंच पर कोई ऑर्केस्ट्रा देखने जाने वाले थे हम सब | सब लोग तयार होने की अफरा -तफरी में थे | अचानक माँ को ध्यान आया कि दूध भी उबालना है नहीं तो फट जायेगा |रात के ग्यारह बजे जब हम लोग घर आए तो देखा कि किचन से धुआं उठ रहा है | घर खोलते ही माँ किचन की तरफ़ भागीं | हीटर पर दूध की जगह अल्मीनियम का एक चमकदार पिंड नजर आया | बच्चों ने फ़िर टांग खींची , ' मम्मी दूध का तो बड़ा अच्छा खोआ बन गया है | '

दुनिया की तमाम महिलाओं की तरह मेरी माँ भी अपने मायके को अच्छा और ससुराल को फालतू समझती रहीं आज भी समझती हैं | पापा से नोक-झोंक के लिए ये मुद्दा हमेशा कारगर रहा है |
' अलावलपुर गाँव थोड़े हई| गाँई हई | मोट रहन -सहन , मोट खान -पान | जैसन गाँव टेढ़- टाँढ़ वैसने उहां के लोग । खोजलो से एगो आदमी सोझ न मिल्तवा । उ त हमर बाबुजी बूढ़ हो गेल रहस , आँख से कम सुझईन | बेसी दौड़-धुप क के लरिका खोजे के सामर्थ्य न रहईन । बैल -गड़ी पर बैठ के गेलन , जा के ई नमुना से बियाह ठीक क देलन '

पापा भड़कते हैं , हम बच्चे मजा लेते हैं |

बहु भी उन्हीं के नक्शेकदम पर है | एक बार सास से शिकायत की - ' मेरे किस्मत मे भी आपका ही का बेटा ठोकाना था | माँ कि जिद और जल्दबाजी न रहती तो मैं कभी इस से शादी न करती ' माँ ने छूटते ही कहा - 'तुम्हारी माँ अगर दिया ले के भी खोजतीं तब भी पूरे भारत मे मेरे बेटे जैसा दामाद उन्हें नहीं मिलने वाला था |'
मैं थोड़ी देर तक छाती और नथुने दोनों फुलाकर दोनों को देखता रहा |
शायद दोष हेलो शैंपू का नहीं था |नौकरी और साथ-साथ तीन-तीन बच्चों के पालने , पढाने-लिखाने और बेटियों के शादी -ब्याह की चिंता हर मध्यमवर्गी माँ -बाप के बाल असमय ऐसे ही सफेद कर देती है |
मेकप और सौन्दर्य प्रसाधनों से माँ को ताउम्र चिढ़ सी ही रही |
इसकी शुरुआत कहाँ से हुई ये तो मुझे नहीं पता लेकिन मैंने माँ को लक्स साबुन और पोंड्स पाउडर के अलावा और कुछ इस्तेमाल करते कभी नहीं देखा |
शैंपू के नाम से बिदकती हैं और एक भाषण सुना देती हैं जो कि अभी तक सौभाग्य से हिन्दुस्तान लीवर और प्रोक्टर एंड गैम्बल (P&G) के शेयरधारकों और मैनेजमेंट तक नहीं पहुँच पाया है, अन्यथा वो इन्हें अगवा करा लेते या मुँह बन्द रखने के लिये कुछ मन-माना हर्जाना दे देते ।
"तुम्हारे पापा कई साल पहले CSD कैंटीन से हेलो शैंपू लेकर आए थे | उसको लगाते ही मेरे एक चौथाई बाल सफेद हो गए उसके बाद से हमने रीठा , मुलतानी मिट्टी और मेहंदी के अलावा सर मे और कुछ नहीं लगाया | "

अब सोंचता हूँ तो लगता है कि शायद दोष हेलो शैंपू का नहीं था |
नौकरी और साथ मे तीन-तीन बच्चों के पालने , पढाने-लिखाने और बेटियों के शादी -ब्याह की चिंता हर मध्यमवर्गी माँ -बाप के बाल असमय ऐसे ही सफेद कर देती है |27 साल की उम्र मे हेलो शैंपू ने सिर्फ़ चौथाई केशों मे ही सफेदी की चमकार फैलाई थी | चिंता ने 40 की वय छूने से पहले ही उनके बालों को काली -सफ़ेद खिचड़ी मे तब्दील कर दिया |

बच्चे कहते हैं - 'क्या मम्मी एक इस उम्र मे एक दम बुढ़िया जैसी दिखने लगी हो | तुमसे 10 -15 साल बड़ी औरतें कितना मेंटेन कर के रहती हैं | तुम्हारी ही उम्र की हेमा-मालिनी को देखो | बागबान मे कितनी सुंदर लग रही थी | चलो , ब्यूटी पार्लर मे तुम्हारे बाल डाई करा देते हैं , थोड़ा आई-बरो भी ठीक करा देते हैं |'
माँ कहती हैं - ' अब हमको कौनो बछेडी बनना है ? हमें कोई केश काले नहीं कराने ना ही हम भँव तम्वाने जायेंगे | तुम लोगों के दिन हैं तुम लोग जाओ | बछेडी -बछेड़ा जो बनना है सो बनो | हम को हेमा-मालिनी से क्या तुलना करनी है ? उसके रहन -सहन , खान -पान मे हम कहाँ लगेंगे ? '
२००३ में सिंगापुर आई थीं तो मैंने और बहु ने कमर-कस ली थी कि इस बार इनका काया-कल्प कर के ही मानेंगे | बालों पर कैंची तो थोड़ी चल भी पायी लेकिन रंग-रोगन तब भी न चढ़ा पाये हम दोनों |
' रिएक्शन (reaction) कर जायेगा । देखो तो लिखे भी हुये है कि पहले थोड़ा -सा लगा कर 12 घंटे इंतजार कीजिये । परसों हम लोगो को जाना है । जिद नहीं करो बेटा । हम बोकारो मे जरूर लगवा लेंगे | '
इस वाकये को चार साल हो गये लेकिन लॉरियेल का वो हेयर डाई आज भी बोकारो मे वैसे- का वैसा ही पड़ा है । बहु अभी भारत मे ही है । देखें इस बार मम्मी पर बहु का कितना जोर चल पाता है ।
रहन-सहन की सादगी जो निश्चय ही कभी साधनों के अभाव मे शुरू हुई थी धीरे -धीरे आदत में तब्दील हो गयी |यही एक चीज है जिसपर पापा-ममी में बिना किसी विवाद के तुरंत सहमति बन जाती है |
रहन-सहन की सादगी जो निश्चय ही कभी साधनों के अभाव मे शुरू हुई थी । धीरे -धीरे आदत में तब्दील हो गयी |यही एक चीज है जिसपर पापा-ममी में बिना किसी विवाद के तुरंत सहमति बन जाती है |
पहले कहती थीं - ' तुम्हारे पापा को यदि कोई मंगनी मे भूसा भी लाद देगा तो वो उठा कर घर मे रख लेंगे | कहीं कोई नट-बोल्ट , स्क्रू कुछ भी मिल जाए उठा कर घर ले आते हैं | एक दिन बस इतवार को थोड़ा आराम का वक्त मिलता है उसमे भी ये शख्स उछ्वाद कर के रख देता है । पापा इस शिकायत से एकदम बेपरवाह हथौड़ी -पेचकस ले कर किसी बिजली के स्विच को तो कभी किसी हीटर को अपनी ठाक -ठुक से ठीक करने मे लगे रहते हैं |'

माँ चाहे जो कहें इस मामले मे पापा से दो कदम आगे ही हैं -पीछे नहीं |
हर चीज की एक उपयोगी -वय (useful life) होती है जिसके बाद उसे फेंकना ही ठीक रहता है लेकिन माँ को ये बात अब शायद ही समझाई जा सकती है |
मैं याद करता हूँ कि खाने की जो प्लेटें 1982 मे खरीदी गयी थीं वो 25 सालों के इस्तेमाल से घिस चुकी हैं लेकिन आज भी किचिन में शोभायमान हैं |

मैं कहता हूँ - ' मम्मी फेंको ना ! ये क्या फालतू बर्तन रखे हुये हैं तुमने अभी तक सजा कर ?'
माँ - ' बेटा ! इंसान चाहे कितनी-भी तरक्की कर ले , आसमान छूने लगे लेकिन उसके पाँव हमशा यथार्थ के धरातल पर जमे रहने चाहियें । हम लोग भी तो पुराने हो गए हैं ? हमे उठा कर कहां फेंकोगे ? '

मैं निरुत्तर हो जाता हूँ | बहस के बजाये जाकर एक नया सेट खरीद लाया चाइना -वेयर का |माँ ने उसको संभाल कर रख दिया है
जब बेटा -बहु आते हैं तो आने से पहले निकाल लेती हैं |
कुछ चीजें शायद वंशानुगत होती हैं ।
माँ से लड़ते -झगड़ते , पुरानी चीजों को सहेज कर रखने की उनकी आदत पर बहस करते -करते पता ही नहीं चला कि कव वही प्रवृत्ति मुझ पर आकर हावी हो गयी और इस मामले मे उनसे भी आगे ले गयी ।
माँ स्टील के बर्तन फेंकने से कतराती रहीं , मैं प्लास्टिक के लेवल पे आ पहूँचा । प्लास्टिक के डिस्पोजेबल चम्मच और डब्बे धो-धा कर फिर से इस्तेमाल कर लेता हूँ । जूस के डब्बों मे मे दाल रखने लगा हूँ । पिछ्ले साल संजीव जी के यहाँ गया तो देखा कि चमकदार पारदर्शी प्लास्टिक की प्लेटों मे खाना पड़ोसा जा रहा है । लोगों ने खाना खा कर जब प्लेटे फेंकनी शुरू की तो मुझे बडा दुख हुआ। इतनी निर्ममता से इतनी सुन्दर प्लेटें भला कैसे फेंक रहे सब लोग ?
खैर, अमरीका आकर मेरी इस सोंच को थोडा बल मिला है । अपने टुच्चेपन को ईको-फ्रेंड्लीनेस के जामे मे मैं बड़ी सहजता से छुपा सकता हूँ यहाँ पर । अब तो कागज की थैलियाँ भी रिसाईकिल कर रहा हूँ और अक्सरहाँ माँ को याद कर रहा हूँ ।
पात्र बदलते रहे हैं पर मातृत्व की भावना सदियों से वही रही है | लोग कितना भी साईंस पढ़ लें लेकिन बच्चे पे जब बात आती है तो तमाम माएँ डिफेंसिव हो जाती हैं । बुरी नजर वाले की जुबान मे सूईयाँ पहले भी चुभाती रही हैं भविष्य मे भी चुभाती रहेंगी ।
घर से बाहर निकले 17 साल होने को आये हैं ।
साल मे एक-दो दफे ही जाना हो पाता है । मेरी जगह बड़ी दीदी के बेटे गोलू ने ले ली है । अब माँ तो माँ हैं । वात्सल्य का झरना है तो उसे निरंतर बहना भी है । किसी न किसी की तरफ उसकी बूँदे जायेंगी ही । बेटा दूर है तो तो नाती पर फुहारें पड़ रही हैं । जब कभी पास होता हूँ तब आवाज मुझे देना चाहती हैं पर अनायास ही मुँह से 'ऐ ! गोलू ' निकल जाता है ।
फिर कहती हैं , ' दुर जो ! तोरा के शोर करईत रली ह लेकिन गोलू -गोलू मुँह से निकलइत है ।'
मैं भी चुहल करने का बहाना जरा नहीं छोड़ता ।
कहता हूँ - ' माई तू अब हमरा के दुलार न करले । खाली नाती सब के मानले । '
माँ अपनी झेंप को तुरत झटक देती हैं - ' हँ ! तोरहीन त बिना दुलारे कयले घोड़ा सन के हो गेले '
सच ही कहती हैं वैसे ।
आज भी बेटे की शिकायत एकदम नहीं सुन पाती हैं |
5 साल पहले जब श्रीमती जी पहली दफा बोकारो गयीं अपने ससुराल तो माँ को कहा - ' मम्मी , देखिए ना कितना मोटा हो गया है आपका बेटा | '
माँ कहती है - ' सुईया - सुईया ! अरे लिल्ली , बेटा नजर नहीं लगाओ सुदीप को | बहुत कष्ट से पाला हुआ बच्चा है | "
लिली हंसती है |

4 साल के बाद वही कहानी दुहाराई जाती है | बस पात्र बदल गए हैं |
समीक्षा चावल- रोटी नहीं खाना चाहती है | केक , आईसक्रीम और भी दूसरी फालतू चीजें खाती रहती है | बाप की तरह मिठाई बहुत पसंद है | एक ही दिन मे 2-2 सोन- पापडी ख़ुद ही निकाल कर जब खाया तो मैं कहता हूँ - 'लिल्ली , तुम्हारी बेटी मोटी होती जा रही है | "
लिली - " थू -थू !! सुईया - सुईया ! ख़बरदार जो मेरे बच्चे को मोटा कहा ! ख़ुद को देखा है कभी ? "
मैं खबरदार हो जाता हूँ ।

पात्र बदलते रहे हैं पर मातृत्व की भावना सदियों से वही रही है | लोग कितना भी साईंस पढ़ लें लेकिन बच्चे पे जब बात आती है तो तमाम माएँ डिफेंसिव हो जाती हैं । बुरी नजर वाले की जुबान मे सूईयाँ पहले भी चुभाती रही हैं भविष्य मे भी चुभाती रहेंगी ।
दुनिया की सभी माताओं के सम्मान में श्री ओम व्यास जी की खुबसूरत कविता की चन्द पक्तियाँ पेश हैं -

माँ…माँ संवेदना है, भावना है अहसास है
माँ…माँ-माँ संवेदना है, भावना है अहसास है
.....
माँ…माँ आँखों का सिसकता हुआ किनारा है,
माँ…माँ गालों पर पप्पी है, ममता की धारा है,
.....
माँ…माँ चिंता है, याद है, हिचकी है,
माँ…माँ बच्चे की चोट पर सिसकी है,
.....
तो मैं कला की ये पंक्तियाँ माँ के नाम करता हूँ,
और दुनिया की सभी माताओं को प्रणाम करता हूँ.
पूरी कविता आप यहाँ पढ़ सकते हैं |
आभार : यदि आपको ये संस्मरण पसन्द आया है तो मैं कहूंगा कि आप फुरसतिया जी (अनुप शुक्ल ) का - सपनो की डोर पड़ी पलकों का पालना - जरूर पढें ।
अनूप भाई कानपुर के रहने वाले हैं । हिन्दी मे बहुत उम्दा लिखते हैं । हाँ, वीडिओ मे लोरी जरूर सुनियेगा उनकी माँ की आवाज मे ।

जब से ये पढा तब से मन कुलबुला रहा था कि अब कुछ हम भी लिखें अपनी अम्मा के बारे में। अनुप भाई आपकी प्रेरणा के लिये बहुत -बहुत धन्यवाद ।