गुरुवार, 7 दिसंबर 2006

एक अर्सा हो गया

हिन्दी मे लिखे हुए एक ज़माना हुआ। पहले कम से कम साल मे चन्द बार ही सही लेकिन अपनी माँ को चिट्ठी ही लिख लिया करता था। लेकिन लगभग डेढ दशक से भारत मे आए टेलीकौम बूम ने वो भी चौपट कर डाला। हिन्दी की कौन कहे , एक जमाने से मैने किसी भी भाषा मे अब चिट्ठियाँ नही लिखीं हैं । इंटरनेट के आगमन से ये अच्छा हुआ कि पत्र लिखने कि विधा जो कि धीरे धीरे लुप्त होती जा रही थी , दुबारे से प्रचलित हो गयी । अपने नये अवतार- इमेल (e-mail) के रुप मे। कुछ आंकडो के अनुसार यह इंटरनेट का सबसे लोकप्रिय इस्तेमाल है।चिठ्ठा लेखन एक दूसरी विधा है जिसको ब्लोगिंग के रुप मे इंटरनेट ने पुनर्जीवित किया है।
इस ब्लोग को शुरू करने का उद्देश्य कुछ ऐसा ही है। कुछ अपने मन की बात लिखी जाये, कुछ आपके दिल की बात पढी जाये। अपने उदगार व्यक्त किये जायें अपनी ही भाषा मे।
आपकी टिप्पणियो से उत्साह बना रहेगा ।