गुरुवार, 14 जून 2007

हालात

कोई उम्मीद बार नहीं आती,
कोई सूरत नज़र नही आती।

मौत का एक दिन मूयय्यं है,
नींद क्यों रात भर नही आती।

आगे आती थी हाल-ए-दिल पे हंसीं,
अब किसी बात पर नहीं आती।

जानता हूँ सवाबे-ताआतो- ज़ुहद,
पर तबियत इधर नहीं जाती।

है कुछ बात ही ऐसी कि चुप हूँ,
वरना क्या बात कर नहीं आती।

क्यों ना चीखुं कि याद करते हैं,
मेरी आवाज ग़र नहीं आती।

हम वहाँ हैं जहाँ से हमको भी,
कुछ हमारी खबर नहीं आती।

मरते हैं आरजू मे मरने की,
मौत आती है पर नहीं आती।

काबा किस मुँह से जाओगे ग़ालिब,
शर्म तुमको मगर नहीं आती।

--- ग़ालिब

प्रेम कि बाजी

खुसरो बाजी प्रेम कि, मैं खेली पी के संग,
जो जीती तो पीया मोरे, जो हारी पी के संग।

--- अमीर खुसरो
मोहे नोंच नोंच खायियो कागा, खुन बुझैयो प्यास,
ये दो नैना मत खायियो, मोहे पिया मिलन कि आस।

-------------- अज्ञात

शनिवार, 9 जून 2007

जिन्दगी बेरहम हुआ करे, दर्द ही अब दिल कि दवा हुआ करे,
इश्क भी अब सज़ा हुआ करे, बेवफा ही सनम हुआ करे।।

मेरी कब्र खुले आसमान मे डालना तुम सुनो,
ताज के मुर्दों को अब थोरी शरम हुआ करे।।

नेकी- बदी कुफ्र, हराम, पतझर - बहार ओ सुबहो शाम,
जहाँ कि जद्दो - ज़हद बस कोई भरम हुआ करे। ।

मोद प्रकाश,

शुक्रवार, 8 जून 2007

कोई जुस्तजू ज़हन में अब नहीं आती है,
जिन्दगी एक बड़ा सवाल बन चिधाती है

दिल तो खुश रहता है, सवालों कि भिड़ में,
खामोशी गूंज बन बारहा सताती है,

मुझको चाहिए क्या एक कब्र के सिवा,
और उस के वास्ते आसमान कि छाती है।

ये टंगी तस्वीर ही तन्हाई का साकी मिरा,
रूह मिलते ही मुझे छोर चली जाती है।

बढ़ता हुआ साया और ढलती हुई शाम है,
घर के कोने मे हवा से डरती हुई बाती है,

कौन जिसने देखा नही लोहे कि अकड़ 'अति',
मेरी नज़रों के सामने जलती हुई भाती है।

----- मोद प्रकाश,
`हम जानते तो इश्क ना करते किसू के साथ,
ले जाते दिल को खाक में इस आरजू के साथ।

-------- मीर
आंखें सफ़ेद दिल भी जला इंतज़ार मे,
क्या कुछ ना हम भी देख चुके हिज्र - ए - यार मे,

दुनियां मे एक दो नहीं करता कोई मुकाम,
जो है रावारवी ही में है इस दियार में।

देखीं एक रोज़ तेरी मस्त अन्खरियां,
अन्गारायियां सी लेतें हां अब तक खुमार में।

---------------मीर
आरजुएं हज़ार रखते हैं,
फिर भी हम दिल को मार रखते हैं।

बर्क कम हौसला है, हम भी तो,
दिल के बेकरार रखते हैं।

ना निगह ने पयाम, ने वादा,
नाम को हम भी यार रखते हैं।

------------मीर
उलटी हो गयीं सब तदबीरें कुछ तो दवा ने काम किया।
देखा इस बीमार - ए - दिल ने आख़िर काम तमाम किया।

अहद-ए-जवानी रो रो काटी, पीरीं मे लीं आंखें मूंद,
यानीं रात बहुत जागें थे, सुबह हुयी आराम किया।

-----------------मीर
जो बीत गयी सो बात गयी।

जो बीत गयी सो बात गयी।

जीवन मे एक सितारा था,
माना वह बेहद प्यारा था,

वह डूब गया तो डूब गया,
अम्बर के आनन् को देखो,
कितने इस के तारे टूटे,
कितने इस के प्यारे छूटे,
जो छूट गए फिर कहाँ मिले,
पर बोलो टूटे तारों पर,
कब अम्बर शोर मचाता है,
जो बीत गयी सो बात गयी।

तुम्हारे नील झील से नैन

तुम्हारे नील झील से नैन , नीर निर्झर से लहरे केश ,
करों मे लतरों सा लचकाव , करतालों में फूलों का वास ,
तुम्हारे नील -झील से नैन , नीर निर्झर से लहरे केश |

इधर झुकती अरुणारी सांझ , उधर उगता पुनों का चांद ,
सरो-श्रिंगों , झरनों मे मे फूट पड़ा है किरणों का उन्माद ,
तुम्हें अपनी बांहों मे जन नही कर पाता मैं अनुमान,
प्रकृति मे तुम बिम्बित चहूँ ओर - कि बिम्बित प्रकृति तुममे अशेष,
तुम्हारे नील झील से नैन, नीर निर्झर से लहरे केश।


------- बच्चन

prakriti

तुम्हारे नील जील से नैन, नीर निर्झर से लहरे केश।

तुम्हारे तन का रेखाकार वही कमनीय कलामय हाथ,
कि जिस मे रुचिर तुम्हारा देश रचा गिरी ताल माल के साथ,
करों मे लतरों का लाचकाओ, करतालो मे फूलों का वास,
तुम्हारे नील जील से नैन, नीर निर्झर से लहरे केश।

उधर झुकाती अरुनारी सांझ, इधर उठाता पुनों का चांद,
सरों, श्रीन्गों, झरनों मे फूट पड़ा है किरणों का उन्मांद।
तुम्हें अपनी बांहों मे देख नही कर पाता मैं anumaan,

बुधवार, 6 जून 2007

दिल की बात

दिल की बात बताना क्या, नासमझे को समझाना क्या ,
दिल कि बात जुबाँ क्या समझे , बार बार दुहराना क्या |

इश्क मे कुछ भी कहना क्या , इश्क मे कुछ भी सुनना क्या,
इश्क हुआ फिर 'मैं' ना रहा तो , इश्क की रीत निभाना क्या|

खुदा की रीत निभाना क्या , मंदिर- मस्जिद जाना क्या,
वो तो है अन्दर बैठा ही , जाना क्या पहचाना क्या|

इस दुनिया में आना क्या, इस दुनिया से जाना क्या,
मैं यहाँ सदियों से बैठा, मेरा यहाँ ठिकाना क्या |

कहता है ज़माना क्या , शेख की बात को माना क्या,
दिल में जो छुपकर बैठा है , उस को शीश नवाना क्या|

चाहत

कहते कहते होंठ मे छाले निकल गए ,
हाय ! पर मुझको सुनने वाले निकल गए |

सोचता था अब कि एक छत मेरे सर पे हो ,
ये क्या खुदा कि मुहँ के निवाले निकल गए |

कोशिशें कि जीत लूँ दुश्मनों के भी दिल
देखता हूँ कि चाहने वाले निकल गए |

सोंचता हूँ मैं अब चुप ही रहूँ 'अति' ,
क्या करूँ पर - जुबां के ताले निकल गए |

कह तो लूँगा मैं खामोशियों की शायरी ,
दर्द-ए- दिल मगर, समझने वाले निकल गए |

ये कैसा वक्त आ गया है देखिए ,
खुदा के बन्दों के दिवाले निकल गए |

चलो , चलें यहाँ से ऐ मेरे हमसफ़र !
यहाँ से सारे जाने वाले निकल गए |

कब्र जब हमने अपनी खुद ही खोद ली ,
आस्तीन के सांप जो पाले निकल गए |

आज कौन जिसको हम अपना कह सकें ,
अपने सभी गैरों के हवाले निकल गए |

ख्वाइश थी आस्मां की मगर मुझको जब मिला ,
उसमें चमकने वाले सभी सितारे निकल गए |

- मोद प्रकाश