बुधवार, 6 जून 2007

चाहत

कहते कहते होंठ मे छाले निकल गए ,
हाय ! पर मुझको सुनने वाले निकल गए |

सोचता था अब कि एक छत मेरे सर पे हो ,
ये क्या खुदा कि मुहँ के निवाले निकल गए |

कोशिशें कि जीत लूँ दुश्मनों के भी दिल
देखता हूँ कि चाहने वाले निकल गए |

सोंचता हूँ मैं अब चुप ही रहूँ 'अति' ,
क्या करूँ पर - जुबां के ताले निकल गए |

कह तो लूँगा मैं खामोशियों की शायरी ,
दर्द-ए- दिल मगर, समझने वाले निकल गए |

ये कैसा वक्त आ गया है देखिए ,
खुदा के बन्दों के दिवाले निकल गए |

चलो , चलें यहाँ से ऐ मेरे हमसफ़र !
यहाँ से सारे जाने वाले निकल गए |

कब्र जब हमने अपनी खुद ही खोद ली ,
आस्तीन के सांप जो पाले निकल गए |

आज कौन जिसको हम अपना कह सकें ,
अपने सभी गैरों के हवाले निकल गए |

ख्वाइश थी आस्मां की मगर मुझको जब मिला ,
उसमें चमकने वाले सभी सितारे निकल गए |

- मोद प्रकाश

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