बुधवार, 6 जून 2007

दिल की बात

दिल की बात बताना क्या, नासमझे को समझाना क्या ,
दिल कि बात जुबाँ क्या समझे , बार बार दुहराना क्या |

इश्क मे कुछ भी कहना क्या , इश्क मे कुछ भी सुनना क्या,
इश्क हुआ फिर 'मैं' ना रहा तो , इश्क की रीत निभाना क्या|

खुदा की रीत निभाना क्या , मंदिर- मस्जिद जाना क्या,
वो तो है अन्दर बैठा ही , जाना क्या पहचाना क्या|

इस दुनिया में आना क्या, इस दुनिया से जाना क्या,
मैं यहाँ सदियों से बैठा, मेरा यहाँ ठिकाना क्या |

कहता है ज़माना क्या , शेख की बात को माना क्या,
दिल में जो छुपकर बैठा है , उस को शीश नवाना क्या|

कोई टिप्पणी नहीं: