शनिवार, 9 जून 2007

जिन्दगी बेरहम हुआ करे, दर्द ही अब दिल कि दवा हुआ करे,
इश्क भी अब सज़ा हुआ करे, बेवफा ही सनम हुआ करे।।

मेरी कब्र खुले आसमान मे डालना तुम सुनो,
ताज के मुर्दों को अब थोरी शरम हुआ करे।।

नेकी- बदी कुफ्र, हराम, पतझर - बहार ओ सुबहो शाम,
जहाँ कि जद्दो - ज़हद बस कोई भरम हुआ करे। ।

मोद प्रकाश,

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