शुक्रवार, 8 जून 2007

कोई जुस्तजू ज़हन में अब नहीं आती है,
जिन्दगी एक बड़ा सवाल बन चिधाती है

दिल तो खुश रहता है, सवालों कि भिड़ में,
खामोशी गूंज बन बारहा सताती है,

मुझको चाहिए क्या एक कब्र के सिवा,
और उस के वास्ते आसमान कि छाती है।

ये टंगी तस्वीर ही तन्हाई का साकी मिरा,
रूह मिलते ही मुझे छोर चली जाती है।

बढ़ता हुआ साया और ढलती हुई शाम है,
घर के कोने मे हवा से डरती हुई बाती है,

कौन जिसने देखा नही लोहे कि अकड़ 'अति',
मेरी नज़रों के सामने जलती हुई भाती है।

----- मोद प्रकाश,

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