गुरुवार, 14 जून 2007

हालात

कोई उम्मीद बार नहीं आती,
कोई सूरत नज़र नही आती।

मौत का एक दिन मूयय्यं है,
नींद क्यों रात भर नही आती।

आगे आती थी हाल-ए-दिल पे हंसीं,
अब किसी बात पर नहीं आती।

जानता हूँ सवाबे-ताआतो- ज़ुहद,
पर तबियत इधर नहीं जाती।

है कुछ बात ही ऐसी कि चुप हूँ,
वरना क्या बात कर नहीं आती।

क्यों ना चीखुं कि याद करते हैं,
मेरी आवाज ग़र नहीं आती।

हम वहाँ हैं जहाँ से हमको भी,
कुछ हमारी खबर नहीं आती।

मरते हैं आरजू मे मरने की,
मौत आती है पर नहीं आती।

काबा किस मुँह से जाओगे ग़ालिब,
शर्म तुमको मगर नहीं आती।

--- ग़ालिब

1 टिप्पणी:

Yashwant Mathur ने कहा…


दिनांक 17/03/2013 को आपकी यह पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं.आपकी प्रतिक्रिया का स्वागत है .
धन्यवाद!

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अनाम रिश्ता....हलचल का रविवारीय विशेषांक...रचनाकार-कैलाश शर्मा जी