शुक्रवार, 8 जून 2007

prakriti

तुम्हारे नील जील से नैन, नीर निर्झर से लहरे केश।

तुम्हारे तन का रेखाकार वही कमनीय कलामय हाथ,
कि जिस मे रुचिर तुम्हारा देश रचा गिरी ताल माल के साथ,
करों मे लतरों का लाचकाओ, करतालो मे फूलों का वास,
तुम्हारे नील जील से नैन, नीर निर्झर से लहरे केश।

उधर झुकाती अरुनारी सांझ, इधर उठाता पुनों का चांद,
सरों, श्रीन्गों, झरनों मे फूट पड़ा है किरणों का उन्मांद।
तुम्हें अपनी बांहों मे देख नही कर पाता मैं anumaan,

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