शनिवार, 28 जुलाई 2007

नीरज कि ग़ज़ल

रंग ऋतू के बदल गए होंगे।
वो जिधर से निकल गए होंगे।

रात बाजार मे अँधेरा था।
खोटे सिक्के भी चल गए होंगे।

तुमसे होकर जुदा सभी आंसू।
गीत-ग़ज़लों मे ढल गए होंगे।

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