बुधवार, 11 मार्च 2009

आज होली है

हैमिल्टन के इस होटल में सुबह से ही कुछ अजीब सी मानसिक खलबली से हो रही है। होली है और मैं यहाँ पर होटल में बैठा क्या कर रहा हूँ। पर अगर होटल में नही होता तो क्या घर पर होता? या क्या कहीं दोस्तों के साथ भंग पी रहा होता और होली की होलिया पार्टी में धूम मचा रहा होता? अगर यहाँ कनाडा में नही होता तो इंग्लैंड में अपने ऑफिस में होता और फिर वही सेल और टारगेट के बीच में झूल रही होती जिंदगी।

ये ठंडी जगह, उंगली बहार निकालो तो लगता है की कुछ देर में कट कर गिर जाएगा। कैसे जिंदगी ने यहाँ पर आकर अपना बसेरा किया है? कैसे कुछ लोग यहाँ पर आकर बसने की सोचने लगे कभी किसी समय में। किसी वैज्ञानिक शोध में ये कहा गया है की मानव नही कभी नही सोचा था की ऐसी जगह पर उसे रहना भी पड़ेगा। ये तो उनकी जमीन ही खिसकती हुई उत्तर की ओर चली आयी और मौसम धीरे धीरे ठंडा होने लगा। ये हुआ एक दिन में नही पर लाखों लाखों सालों में और सैकडों सदियों में। किसी को पता भी नही चला और प्रकृति ने किसी की पुरी जमीन को यहाँ से उठा कर वहां कर दिया। उस को समुद्र बनाना था उस जगह पर और इस लिए उस को वो जगह खाली चाहिए थी तो उस ने उस जमीन को ही वहां से उठा कर उत्तर की ओर धकेल दिया। चलो सही है ना, वरना आज की मानव जातिको देखें तो इतना धैर्य तो नही होता - बस जगहएक खेल पार्क बनने को तो बस कट दो जमीन को और बना लो छोटा सा तालाब और कभी सोचो भी नही की जो लोग वहां रह रहे हैं उनका क्या होगा।



तो इस धरती पर होली की क्या बात करें - और करने को है भी क्या। अगर इंग्लैंड में भी होते तो ओ होलिया पार्टी तो नही होती।

वो भी क्या दिन थे अपने। याद है अपने पहले साल की नौकरी थी और पुरा बैच उस दिन प्लांट से भाग कर हॉस्टल पहुँच गया था। ये ऑफिसर हॉस्टल था और यहाँ पर हम लोगों की रंगदारी चलती थी। जो खाना है उस का आर्डर कर दो और जो चाहिए उस के लिए फ़ोन कर के कह दो की उस दूकान से उस जरूरी थी। बस उस के बाद और तो कोई नही।

तो उस दिन सारा बैच जुट गया और लाला ( नवीन श्रीवास्तव को हम लोग लाला कहते थे ) लीडर बन गया। प्लान ये बना की होली मनाई जाए एक दम बनारसी स्टाइल में।



अब इस बनारसी स्टाइल से तो हम लोग वाकिफ नही थे। लाला का ज्ञान जरूरी था।

के बड़े कडाही में दूध और भंग मिलाई गई। काजू, पिस्ता, बादाम, और मिसरी का योग लगाया गया। के कनस्तर भंग मिलाया गया और मैदान में एक बड़ा सा गढ्ढा खोदा गया। उस गधधे में भर के कीचड घोला गया। और होली की रवायत पुरी करने के लिए उस में रंग मिलाया गया। धरती के रंग को अलग अगल रंग से मिला कर एक होली की रंग तैयार हो गई।

होली के रंग और साथ में मिला भंग,
दोस्तों के संग और मन में उमंग
तो ऐसी रही होली जो यादगार थी। कहानी हो गई। लोग भंग में लोट पोत होतेराहे। पूरा हॉस्टल परेशान होता रहा। पर वो मजा फिर कभी किसी होली में नही आया।

मंगलवार, 10 मार्च 2009

Holi

होली खेले गोरी शहर में आज पीया के संग,
रंग लगा हर अंग में सारे लोग खड़े हैं दंग