गुरुवार, 10 जनवरी 2013

नए साल पर एक पुराने दोस्त से मुलाक़ात

नए साल पर अनायास ही एक पुराने दोस्त से यदि मुलाक़ात हो जाये तो इसको सुखद संयोग ही कहेंगे। एक जनवरी को हम भी टकरा गए अपनी  पुरानी गर्ल-फ्रेंड से 17 सालों बाद ।बात-चीत का सिलसिला चला तो बस चलता गया।
उसने कहा ,' अरे  पहचाना मुझे ?'

मैं थोड़ी देर के लिए तो उलझन मे पड़ गया कि ये कौन मोहतरमा हैं , फिर झिझकते हुये कहा ,' शक्ल तो पहचानी लगती है लेकिन  सच कहूँ तो थोड़ी कठिनाई हो रही है तुम्हें पहचानने में। '

वो हँसने लगी । बोली , ' तब तो बड़े मेरे पीछे लगे रहते थे , अब बीबी के चक्कर में  सब भूल गए ?'

थोड़ी शमिंदगी और थोड़े कौतूहल मे मैंने पूछा , ' कहीं तुम काजल तो नहीं ? । अब देखो, ऐसा है कि इतने सालों बाद  मुझे तो अपना नाम भी याद नहीं ठीक से , न आईने मे अपना चहरा ही पहचान में आता है ' ।

वो ज़ोर से हँसी। ' वो तो तुम्हें देख कर लग ही रहा है । बहुत फूल गए हो ।या तो बड़े खुश हो  या फिर बीबी के सताये हो ?'

मैंने कहा ,'हो गई टांग खिचाई या कुछ बाकी है ?'

वो फिर मुस्कुरायी , 'अभी-भी याद नहीं आया ? चलो  कुछ-और बात करते है । शायद तुम्हें याद आ जाए। '
मुझे अब घबराहट होने लगी । पता नहीं कौन है और पत्नी के सामने जाने कौन सी राम-कहानी ले कर बैठ जाये।

बोली ,' मुझे छोड़ो , ये बताओ  कि वो लड़की याद है जिसके पीछे साइकिल लेकर भागा करते थे , फोन पर बात करते-करते हकला जाते थे मारे डर के । पूरे दो सेमेस्टर तुमने चौपट किए उसके पीछे । जब उसने भाव नहीं दिया तब मेरे पास आए । '

मैंने कहा , 'मेरी अम्मा, अब बस भी कर ।'

बोली , 'डर गए इतने से ही ।वो डेंटल कालेज वाली लड़की याद है , जो चेस मे पहला इनाम ले गई ।'

' कुछ 'सत्या'  नाम था उसका। उसे तो पता भी नहीं चला कि जनाब उस पर  लट्टू हैं । तुम्हें तो चेस के सारे मोहरों के नाम भी नहीं पता हैं।  तुम्हें क्या भाव देती वो । '

'जहाँ जाते हो वहीं फिसल जाते हो।  '

मैंने झेंपते हुये कहा ,'अब जहाँ फिसलन हो वहाँ तो कोई भी फिसल जाये । फिर मैं कौन सा फन्ने खाँ हूँ । '

वो बोली , 'अरे, बारिश मे कोई फिसले तो बात और है । तुम तो बस !  क्या गर्मी , क्या बारिश , क्या पतझड़ ? हर मौसम मे  फिसलते ही रहे । बारहा , लुढ़क कर हमेशा मेरे पहलू मे ही गिरे । वो कवयित्री लड़की याद है । वो तो बिलकुल तुम्हारे टाईप की थी पर उससे भी कहाँ निभी तुम्हारी। '

अचानक से जैसे मेरे दिमाग की बत्ती जली।

इससे पहले कि ये मेरे सारे कच्चे-चिट्ठे खोल दे , मैंने कहा , ' बस करो ,सब याद आ गया ।  तुम कविता हो । गलती हो गई जो तुम्हे नहीं पहचाना । '

कविता बोली , 'भुलक्कड़  तो तुम शुरू से थे । लेकिन मुझे पहचानने मे भी इतना समय लोगे ये नहीं सोचा था । '

मैंने कहा , ' अब ये बताओ , कि मुँह बंद करने का क्या लोगी ? तब से तुम सालों पुरानी बातों का नॉन -स्टॉप तफ़्सरा कर रही हो । '

 वो थोड़ी नरम हुई ।

' बातें इतनी जल्दी कैसे खत्म होगी? 17 साल बाद मिल रहे हैं हैं हम । बीबी को कुछ देर के लिए टरकाओ ।'
' मैंने तुम्हारा हर बार साथ दिया , पर तुम ने तो मेरी कोई खबर नहीं ली । अपनी दुनिया मे व्यस्त हो  गए।  '

'यार जिंदगी की भाग-दौड़ में  ऐसा ही होता है । हर मोड़ पर कुछ नए दोस्त मिल जाते हैं , पुराने छूट जाते हैं । अब इन बातों का मन मे गिला क्या रखना ? ', मैंने कहा।

'तब तो ये फिलोसफ़ी नहीं झाड़ते थे ', वो लगभग चिढ़कर  बोली।

'17 साल से जैसे नज़रबंद हूँ । ताजी हवा  को तरस गई । न तुमने खबर ली, न कभी बात की । अब जा कर तुम  मिले हो तो तुम्हारे पास वक्त नहीं ।'

मैंने कहा , 'बस भी कर , बोला ना  गलती हो गई । '

कविता बोली , 'इतनी आसानी से  जान नहीं छूटेगी तुम्हारी । गलती की सजा तो भुगतनी होगी ।
'
मैं बोला , ' अच्छा बाबा । बोलो क्या चाहिए ? तुम्हारी तसल्ली के लिए जो भी बन पड़ेगा वो करूँगा। '

'पक्का ?'
'हाँ। पक्का '

'ठीक है । तो फिर आज सारी रात मुझसे बात करो ?'

'अरे बाबा , तब से वही तो कर रहा हूँ । अब रात बाकी कहाँ है ? सुबह के पाँच बज गए बात करते करते । '

'मुझे शॉपिंग करनी है । नए कपड़े लेने हैं । देखो तो कितनी आउट्डेटेड लग रही हूँ इस पुराने ड्रेस में ।'

'अच्छा, कल कर कर लेंगे शॉपिंग ।

'नहीं , कल-कल करके तुमने सालों टरकाया है मुझे । '

' ठीक है । आज ही करेंगे ।  और कुछ ?'

'हाँ। '
' फरमाइए ? '

'मुझे तुम्हारे दोस्तों  से भी मिलना है ।'

'मेरी माँ !  अब क्या जान लोगी । पत्नी को सफ़ाई देते-देते ही अधमरा हो जाऊँगा। अब क्या दोस्तों को भी मेरी राम-कहानी सुनाओगी, ताकि वो साले, सालों तक मेरी टांग खींचते रहे ।'

'तुम किसको कैसे संभालोगे , वो तुम जानो । मुझे तुम्हारे दोस्तों से मिलना है और आज ही मिलना है । '

'ठीक है । ड्न डील  है । अभी शनिवार की सुबह हो रही है । कम से कम उन्हे उठ तो जाने दे । पक्का वादा की उठते ही सबसे मिलवा दूँगा। '

'और कुछ?'

वो थोड़ी देर सोचती रही ।

' देखो मुझे ज़ोर की नींद आ रही है , जल्दी से बोलो यदि कुछ और चाहिए तो।'

' हाँ, मेरा पुराना घर मुझे पसंद नहीं । मुझे एक नया अपार्टमेंट ले दो ।'

'और वादा करो की अब मुझसे रेगुलर मिलने भी आया करोगे , नए अपार्टमेंट मे ।

नींद से बोझल मैं एकदम अधमरा हुआ जा रहा था । हामी भरने के सिवा कोई उपाय नहीं था ।

'ठीक है । अपार्टमेंट भी ले दूँगा । पर अपार्टमेंट कोई ड्रेस या जूते तो है नहीं  कि बस मेसीज  ( Macys) गए और उठा लिया । थोड़ा वक्त दो । वो भी हो खरीद लेंगे । थोड़ा डिज़ाइन, ले-आउट ये सब देखने में तो टाइम लगेगा ना ?'

'रही बात नियमित मिलने की , तो वो भी देखना पड़ेगा । मेरी पत्नी ने तुम्हें आज देख लिया है । रोज का मिलना तो घर मे विस्फोटक हो सकता है । महीने मे 2-3 बार मैं छुप-छुपा कर मैनेज कर लूँगा कैसे भी। '

'पक्का ?'

'हाँ । पक्का '

'चलो ठीक है । अब सो जाओ । फिर से लंबे गायब न होना नहीं तो अगली बार भी ऐसे ही सारी रात जगा के रखूँगी। '

मैंने चैन की साँस ली ।


अब चलिये कविता जी को आपसे मिलवा ही देते हैं वादे के मुताबिक। आप भी  सँभल के रहें । और इनसे बात जरूर करें । क्या पता अगले रत-जगे की बारी आपकी हो।
लगे हाथ, नए वर्ष पर आप सभी को बहुत-बहुत शुभकामनायें।

एक छोटा सा मुक्तक है नए साल पर आप सबके लिए

नया साल
नया साल आता है ,
सहेजकर लाता है,
साथ में उम्मीदें, आशाएँ ,
खुशियाँ, मुस्कुराहटें।
कई बार संग-संग,
आती हैं बाधाएँ ,
चिंता-परेशानी,
मुश्किल, हैरानी।
साथ में छुपकर ,
आता है हल भी।
आफ़तों के साथ ,
उनसे लड़ने का बल भी।
नया साल जिस भाँति आना हो आए ,
हम हैं तैयार, तुम भी तैयार रहना
हर-एक पल, हर एक लम्हा जीभर जी जाएँ ।

चलते -चलते

सुखद संयोग है कि 1 जनवरी ,1996 को लिखी गई ये कविता ,17 सालों बाद, नए साल पर ही  घर की सफ़ाई करते हुए एक पुराने बक्से से ,मानों  'हैप्पी न्यू  इयर ' बोलती हुई निकल पड़ी और फिर रुकने का नाम ही न ले। इनकी दो फर्माइशें तो पूरी कर दी हैं। इनके पीले पड़ते ड्रेस को बदल कर डिजिटल ड्रेस पहना दिया है। ब्लॉगर पर कविता से 17 साल पुरानी मुलाक़ात और आज उनसे की वार्तालाप भी पोस्ट कर दी है, ताकि ये आप सब से मिल सकें, बातें कर सकें।
रही बात नए अपार्टमेंट की, तो हमारी-आपकी राम-कहानियों को उजागर करता, उद्गार (http://www.udgaar.org) जल्दी ही एक नए ठिकाने /नए अवतार मे दिखेगा। अब नई-साइट खड़ी करने मे थोड़ा तो वक्त लगेगा।
तब तक आप कविता से यहीं मिला करें. अपनी कोशिश भी यही रहेगी कि इनसे नियमित मिला करूँ। इन्हे फिर दुबारा रात-भर जगा कर रखने का मौका न दूँ।

2 टिप्‍पणियां:

सञ्जय झा ने कहा…

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..........


likhte rahiye...


sadar.

Sumita Ojha ने कहा…

बड़ी कृपा जनाब! 'गर्लफ्रेंड' कविता जी से हम सभी को मिलवाने के लिए और साथ ही कविताई के 'ट्रेंड' और 'रिचुअल' की तरह असंवेदनशीलता का सारा ठीकरा 'पत्नी' पर मढ़ने के लिए। बहरहाल नया वर्ष मंगलमय हो।