शनिवार, 5 जनवरी 2013

अब और नहीं


जो आँखों को दिखाई दे, वो हर दम सच नहीं होता ।
उसे ही हम भी सच मानें, ये हमसे अब नहीं होता |

तन्हा हम रहे जब भी, सुनी है पाँव की आहट,
पलट कर जब उधर देखा, वहाँ कोई नहीं होता |

लोगों की कही सुनकर, हुआ है हमको क्या हासिल,
करें उनकी कही हर दम, ये हमसे अब नहीं होता।

सुना है मैंने लोगों से, है लंबा रास्ता अपना ,
चले जो साथ में कोई, सफ़र मुश्किल नहीं होता।

है आँखों कि पहुँच कितनी, ये हमको खूब मालूम है,
सिवा चेहरे के इनको और कुछ हासिल नहीं होता।

वो कितना ख़ूबसूरत है ये कैसे मैं तुम्हें कह दूँ , 
उतरे बिना दिल में, ये जानना मुमकिन नहीं होता।

प्रथम कागजी लेखन - जनवरी,1996
कम्प्युटर पर टंकण- जनवरी, 2013 

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