रविवार, 6 अक्तूबर 2013

सास और साग - एक शोधयात्रा

खर-पतवार  या -Amaranthus virdis L.
कई दिनों से कुछ उधेड़बुन  में लगा था. उसका नतीजा आपके सामने इस शोधपत्र के रूप में प्रस्तुत है. चुकि हर  शोधपत्र  को किसी-न- किसी को समर्पित करने की परंपरा चली आ रही है इसलिए ये थीसिस भी किसी को समर्पित है. वो हैं हमारी सास यानि , 'मॉम-इन-लौ'.  उनके सहयोग और पर्यवेक्षण  के बगैर इस शोध का पूरा होना मुमकिन नहीं था।
एक और शख़सियत का नाम लेना जरूरी है। वो हैं हमारी श्रीमतीजी। उन्होंने इस शोध में बाधा नहीं डाली और इसलिए उनको भी धन्यवाद है। उनकी एकमात्र उत्साहवर्धक टिप्पणी जो रही वो कुछ यूँ थी ,
' तुमको भी कुछ काम नहीं है. बस बैठे हो कम्प्यूटर पर. एक तुम दामाद अलावलपुर के और एक तुम्हारी सास चोंचहां की।  दोनों की बुद्धि  साग -पात से ऊपर जा ही नहीं सकती'

खैर , मुद्दे पर आते हैं।  तो समस्या ये थी कि पिछले साल  घर के अहाते में घास कम और खर-पतवार ज्यादा उग आये थे।  सोसाइटी वालों की चिठ्ठी आ गयी तो हमने एक माली को काम पर लगाया। हमने कहा , ' हे माली महारज ! कृपया कर घास को पतवार और हमें सोसाइटी  के प्रकोप से मुक्ति दिलायें'।

उन्होंने २ दिन की मेहनत के बाद अहाते को पतवार ही नहीं , बल्कि घासमुक्त ही कर डाला। मैंने कहा कि ये तो बड़ा गजब कर दिया तुमने। एक  सुन्दर स्त्री  के केशों में कंघा फिराने के बहाने उसे पूरा गंजा कर डाला। माली महाराज बोले ,' घास कम खर-पतवार ज्यादा थे , इसलिए बेहतर यही है  कि इन्हें उखाड़ कर नयी मिट्टी डाल , घास के नए बीज डाले जाएँ। '
इस पुरे प्रकरण में मुझे पतवार के साथ-साथ, लगभग  हज़ार डॉलर से भी मुक्त  होना पड़ा.  लिहाजन बोनस , माली ने मेरे किचन-गार्डन पर भी कृपा दिखाई और ताजी मिट्टी  की एक सतह वहाँ भी डाल दी.

नयी मिट्टी, नयी संभावनाएं 

 नयी उर्वर मिट्टी डलते ही किचन-गार्डन का कलेवर बदल गया। मुझे उसमे टमाटर , भिन्डी , धनिया  और भी काफी कुछ ताजी सब्जियों की संभावनाएँ  दिखने लगीं। यूँ लगा जैसे वो 12'  x 8' की जमीन न हो कर एक बड़ा सा फ़ार्म हो।  मैं अपने सब्जबाग़ देखता भारत चला गया।  महीने भर बाद लौटा तो मेरी आँगनबाड़ी लहलहा उठी थी. सब्जियों से नहीं , बल्कि नयी क़िस्म की पतवार से। मैंने आक्रोश  से उन्हें उखाड़ना शुरू किया।  पर वो पतवार ही क्या जो एक बार उखाड़ देने से दुबारा न उग जाए. मैं थक गया पर पतवार ने हार नहीं मानी।  हर हफ्ते २०-२५ नए अंकुर फूट पड़ते।  खैर अक्टुबर आते-आते मौसम की ठण्ड ने इनकी बढ़त की रफ़्तार को रोक दिया।
2012 की सर्दी भर मैं घर में दुबका रहा और किचन गार्डन का रुख नहीं किया।

भूमिका तो ठीक है पर शोध कहाँ  है? 

आप कहेंगे कि खर-पतवार का दुखड़ा तो ठीक है पर इसमें शोध कहाँ है ? तो ऐसा ही कि शोध अब शुरू होता है।  इस साल मार्च -अप्रैल में जब पाला पड़ना बंद हुआ  तो मैंने फिर से अपनी आँगनबाड़ी यानि किचन गार्डन पर अपनी दृष्टी डाली । पतवार के जंगल को उखाड़ उसमें सब्जियाँ लगाने का प्रण दुहराया। जून में जब सास का पदार्पण हुआ तो हमने खीरा -टमाटर और जुकीनी के पौधॆ लगा भी दिये।  मॉम-इन-लॉ ने नियमित सिंचाई कर इनको जीवित रखा. सभी में  फूल आने लगे।

ये मुँह और गेंधारी का साग 

एक दिन सब्जियों की लतरों के  बीच झाँक रहे ढीठ पतवार को देख मैंने पूछा ,'ममी , ये कौन सा जंगल है? उखाड़-उखाड़ कर थक गया पर तब भी उग आता है.'
सास बोलीं ,' बेटा , ये तो गेंधारी के साग जैसा लग रहा है।  इसीलिये हम इसको नहीं उखाड़े और पानी भी पटा रहे हैं।  '
मैंने कहा, ' सचमुच ! हम तो कोई साग लगाए नहीं '
अब उनका कॉन्फिडेंस थोड़ा डगमगा गया।  बोलीं , ' पता नहीं , तुम्हारे अमरीका में साग होता है भी या नहीं। हो सकता है कोई मिलता जुलता जंगली पौधा हो. जहरीला भी हो सकता है। '

मैंने गेंधारी शब्द के बाद उनकी आगे की  चेतावनी शायद सुनी ही नहीं।  जबतक वो रुको-रूको करतीं  तब तक मैं अपनी नयी खोज के 3-4  पत्ते  चबा चुका था , और कुछ  उनकी तरफ बढ़ा चुका था।  'रुको बेटा , नहीं बेटा' बोलते -बोलते ,  मॉम-इन-लॉ ने भी अमरीकी गेंधारी चख ली.
शाम में तीन-चार घंटे का सस्पेंस  रहा.  सास थोड़ी घबरायी  सी रहीं।  मैंने  माहौल को हल्का करेने के लिए  श्रीमतीजी को बोला कि रात में यदि हमदोनों की तबीयत गड़बड़ हो तो फिक्र न करना। डॉक्टर के पास एक को ही ले चलना।  एक ही दवाई से हम दोनों ठीक हो जायेंगे।

शोध जोर-शोर से शुरू  हो गया 

सुबह उठते ही मैंने कहा , 'ममी , हमलोग ये जंगली पत्ता  खाकर भी ज़िंदा हैं. ये तो पक्का गेंधारी का साग ही है. चलिए आज इसी का साग बनाते हैं।'  बिद्यार्थी preliminary परिणाम पर ही अपना शोध खत्म करने की जल्दी में था लेकिन रिसर्च सुपरवाइजर इतनी जल्दी डिग्री देने के पक्ष में कतई नहीं थीं. 
उन्होंने कहा, 'बेटा, तुम तो मेरा बात पकड़ कर बैठ गए। अनेरुआ पौधे का साग खाना ठीक नहीं। '
मैं बोला , ' ठीक है। अब  हम आपको इसकी पूरी तसल्ली से पहचान  करवा कर  ही  इसका साग खिलाएंगे।'
इन्टरनेट पर गेंधारी साग खोजने बैठा तो ज्यादातर परिणाम, महाभारत वाली गान्धारी के निकले। खैर , खोज को रिफाइन करते -करते , बिरसा -मुंडा कृषी विश्वविद्यालय का एक रिसर्च पेपर निकल आया , ( Edible weeds of tribals of Jharkhand, Orissa and West Bengal ) . इस पेपर से मेरे शोध की कुंजी निकल आयी।
गेंधारी का बोटैनिकल नाम है -Amaranthus virdis L. इतना भर पता चलते ही मैंने Google  , YouTube , Amazon हर स्रोत खंगाल डाला।  गेंधारी को अंग्रेजी में Slender Amaranth या Green Amaranth भी कहते हैं।

शोध के परिणाम 

सारे शोध का लद्दोलबाब यह रहा कि  मैं घर के पिछवाड़े के जंगली पौधॆ के पत्ते ,तना , फूल सब कम्पुटर के बगल में रख , Green Amaranth की तस्वीरों से मिलाता रहा और सास को दिखाता रहा। लेकिन सास थीं कि पूरी तरह से संतुष्ट होने का नाम न लें।  कहें ,' जो फोटो दिखा रहे हो वैसा ही लग तो रहा है है लेकिन पता नहीं मन अभी भी नहीं मान रहा है। '
अब बस एक ही चीज बची थी मिलाने के लिए।  जंगली गेंधारी के सूखते फूलों में से मैं कुछ बीज झाड़ लाया। उनकी हाई resolution  फोटो उतारी और उसको अमरंथ के बीज के फोटो के साथ रख कर दिखाया।
अमरंथ के मानक बीज और किचन-गार्डन की गेंधारी के बीज 

मॉम -इन-लॉ आखिरकर कन्विंस हुईं।  
मैं फटा -फट 'जंगली बनाम असली ' गेंधारी के  पत्ते लेता आया।
एक दम सरल विधि से साग बनायी गयी।  रात के डिनर में सबने चाव लेकर एक-एक चम्म्च गेंधारी का साग खाया। इस घटना के तीन हफ्ते बाद ये वृतांत लिख रहा हूँ तो जाहिर है कि जीवित हूँ साग खा कर भी. 

मेरे साथ  आँगन-बाड़ी की बिचारी गेंधारी भी परीक्षा में पास हो गयी थी.



गेंधारी साग बनाने की सरल विधि 
एक चम्मच तेल , 1 /4  कप प्याज ,  1 /2  चम्मच कुतरा लहसुन और १ चम्मच सफ़ेद तिल, 1  हरी मिर्च  , ५०० ग्राम हरी गेंधारी या Green Amaranth ।  तेल गरम होने पर उसमे पहले तिल , फिर लहसुन और प्याज डालें।  २-३ मिनट तक भुने।  फिर साग डाल कर ,पानी सूखने तक पकाएँ  ।












1 टिप्पणी:

lonely in solitude ने कहा…

Haha, The gendhari must be feeling blessed to have such attention
साग के रूप में ही सही, आप झारखण्ड को अपने साथ अमेरीका ले गए हैं